Swami Haridas Ji

Swami Haridas Ji

Swami Haridas Ji is well known saint of Nimbark Sampradya and known for initiating Sakhi Sampraday, incarnation of Laltia Sakhi, appearance of Bihari Ji, Nikunj Ras, Tansen Bajjubavra, Drupad and much more.

Birth : Bhadra Shukla 8 Vikram Samvat 1537
Birth Place : Rajpur Vrindavan
Left this World : Aashwin Shukla 15 Vikram Samvat 1632
Samadhi : Nidhivan Vrindavan
Diksha : Bhadra Shukla 8 Vikram Samvat 1562
Sampraday : Nimbark
Mother : Chitra Devi
Father : GangaDhar
Guru : Ashudhir Ji
Appearance of Bihari Ji : Aghan Shukla 5 Vikram Samvat 1567
Left Home : In age of 25
Incarnation of : Shri Lalita Sakhi
Compositions : Astadash Siddhant Pad , Kelimaal

Swami Haridas Ji appeared in 1537 and went to Nikunj in 1632 at Rajpur Vrindavan. His parents were Sri Gangadhar and Srimati Chitradevi.

Swami Haridas Ji  got initiated in 1562 in Nimbarkiya Sampraday.

Swami Haridas Ji left his house at the age of 25 and propagated the highest and supreme philosophy of love – Rasopasana of Nitya Vihar.

Swami Haridas Ji is the incarnation of Sri Lalita sakhi who is very dear to Sri Shayama Shyam.

Swami Haridas Ji composed 18 pads on the principles of life and 110 pads on the supreme love of Sri Shyama Shyam.

Swami Haridas Ji requested Sri Shyama Shyam to appear as one in the form of Bihariji for the eyes of the world and they appeared as desired, in the year 1567.

Swami Haridas Ji

Swami Haridas Ji

 

King Akbar and the great musician Tansen were his disciples. With swamiji started the music and its notes.

He also outlined the principles of his sampraday for his disciples and other devotees to follow.

He preached ananyata and sahchari bhaav. He told the devotees that the love on this earth is not complete while the pure love exists only in Nikunj.

The relationships in this world are like that in a holy place, where lot of people come, meet each other and stay with each other for some days and then go back to their own homes.

He said that there is no point in roaming here and there to look for happiness, one should just come to Bihariji and surrender unto him. On this earth a person is like a bird in the cage which is waiting to fly off.

One should consider oneself as a little straw which flies along the wind and does not resist it.

He gave a divine form to the seva in all its three forms – naam, dhaam and swaroop. He guided all his near and dear devotees on all aspects of devotion. We all bow down unto him.

He was heading the Sampraday from 1505 to 1575. Other saints during his period were: Chaitanya Mahaparbhu, Hariram Vyas, Jiv Goswami, Roop Goswami, Meerabai, Hit Harivansh and Vitthalnath.

वृंदावन की रसोपासना के विशुद्धतम स्वरूप के प्रकट्यकर्ता श्री स्वामी हरिदासजी महाराज हैं, जिन्होंने नित्यविहार के भी महामधुर रस सार को रसिक जनों के आस्वादन हेतु सुलभ बनाया। श्री स्वामी हरिदास जी का व्यक्तित्व बड़ा विलक्षण एवम महान् था। नित्यविहार रूप सूक्ष्म धर्म निकुंज महल मे छिपा हुआ था, उसे धराधाम के जीवों को सुलभ बनाने के लिए श्री शयामा श्याम ने अपनी प्राण सखी श्री ललिता को श्रीहरिदास आचार्य वपु में अवतरित किया।

श्री स्वामी हरिदास जी सखी स्वरुप मे श्री श्यामा श्याम की नित्यकेलि मे निरंतर विद्यमान रहते हुए उन्हें भाँति भाँति से लाड़ लड़ाया करते थे। वे इस केलि के समायोजन मे इतने निमग्न रहते थे कि अपनी देह की सुध भी नहीं रहती थी।

स्वामीजी के अठारह पद उपदेशात्मक हैं, जिन्हें सिद्धान्त के अष्टादश पद कहा जाता है और एक सो दस पद उज्जवल सृंगार रस के हैं, जिन्हें श्री केलिमाल कहा गया।

उपासना के छेत्र में स्वामीजी ने एक नविन क्रांति को जन्म दिया । युगल उपासना दी । गुरु भाई देवदत्त से शास्त्रार्थ में पराजित हुए ८ ब्राह्मणों ( दयालदास , मनोहर दास , मधुकरदास , गोविन्ददास , केशवदास , अनन्यदास , मोहनदास , बलदाऊ दस  ) को शिष्यतत्व  प्रदान किया । तानसेन से पराजित हुए बैजूबावरा को शिष्यतत्व दिया और बैजूबावरा ने तानसेन को पराजित किया ।

अकबर का मान भंग किया :
जब तानसेन अकबर के दरबार में दीपक राग गा रहे थे तभी तानसेन का शरीर जलने लगा , दीपक राग की वजह से शरीर मे जलन उत्पन हुई , उस समय तानसेन को राग दीपक का असर को समाप्त करने का राग नहीं आता था अतः दरबार से ही तानसेन ने आपने गुरु स्वामी हरिदास जी को याद किया और इस विकट स्थिति से निकलने के लिए सहायता मांगी , तब स्वामी जी वृन्दावन मे थे , वही से स्वामी जी ने आपने शिष्य के लिए राग मल्हार गया और अकबर के दरबार में तानसेन के ऊपर वर्षा होने लगी , इस जल के प्रभाव से तानसेन को राग दीपक से उपजी जलन शांत हुई. जब अकबर ने ये चमत्कार देखा तो अकबर ने स्वामीजी से मिलने की इच्छा प्रकट की । अकबर स्वामीजी को सुनने के लिए वेश बदल कर तानसेन के साथ आया , तानसेन ने जान बुझ कर स्वामीजी के सामने गलत तरीके से राग गयी , तब स्वामीजी ने सही राग गयी और अकबर को स्वामीजी को सुनने का अवसर मिल पाया , स्वामीजी जो पहले से ही जानते थे , उन्होंने अकबर को बुलवाया और  दर्शन  दिए , अकबर ने अपने शहंशा होने के गर्व से स्वामीजी को कुछ मांगने को कहा , स्वामीजी ने अकबर को यमुना जी के घाट के एक सीडी के कोने को ठीक करने को कहा , जब अकबर वह गया तो उसने देखा वो तट अनगिनत बहुमूल्य रत्नों से बना हुआ है वो जिस सीडी का कोना  टुटा  हुआ  था उस तरह  का रत्न अकबर के पास क्या इस दुनिया में कही नहीं था. अकबर का मान टुटा और वो अपने महल वापस लौट गया ।

दोहा. नित्य बिहार अपार रस, सकल रसनि कौ भूप।

सो मूरति धरि प्रगटी हैं, श्री हरिदास अनूप।।

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http://swamiharidasji.com/swamiji&bihariji.html

https://en.wikipedia.org/wiki/Swami_Haridas

https://hi.wikipedia.org/wiki/

http://bharatdiscovery.org/india/स्वामी_हरिदास

http://swamiharidastansen.org/about.php

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https://www.bihariji.org/haridasji.php

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